नेमि काहे कुं दुख दीनउ हो।
छोरि चले मोहि अहि कंचुरी ज्युं, कुण अवगुण मंइ कीनउ हो॥
तुमसुं नेह पुरातन मेरउ, चरण मन लहइ लीनउ हो।
हूं कंचण की मुंदरि तापरि, तुं तउ अजब नगीनउ हो॥
विरह संतावत निसि दिन मोकुं, अंतर ताप पसीनउ हो।
राजुल कहइ जिनहरख पियाके, गुणसुं दिल रहइ भीनउ हो॥