नेमि काहे कुं दुख दीनउ हो।

छोरि चले मोहि अहि कंचुरी ज्युं, कुण अवगुण मंइ कीनउ हो॥

तुमसुं नेह पुरातन मेरउ, चरण मन लहइ लीनउ हो।

हूं कंचण की मुंदरि तापरि, तुं तउ अजब नगीनउ हो॥

विरह संतावत निसि दिन मोकुं, अंतर ताप पसीनउ हो।

राजुल कहइ जिनहरख पियाके, गुणसुं दिल रहइ भीनउ हो॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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