जांणौं सांई म्हारौ कब घरि आवै।

तिहिं बिन पल पल जनम बिहावै॥

रैंनि बिहाई दिन भी जाई। कबहूं दरस दियौ नहिं आई॥

बैठौ देखै तळपै भारी। करि किरपा अब लेहु उबारी॥

मैं हूं जीव कछू ही नांहीं, दया करौ हरि अंतर मांहीं॥

टीलौ देखै सोई कीजै। गुर देव जांणि दरसण दीजै॥

स्रोत
  • पोथी : संत टीला पदावली ,
  • सिरजक : संत टीला ,
  • संपादक : बृजेन्द्र कुमार सिंघल ,
  • प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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