न जांणौं सांई म्हारौ कब घरि आवै।
तिहिं बिन पल पल जनम बिहावै॥
रैंनि बिहाई दिन भी जाई। कबहूं दरस दियौ नहिं आई॥
बैठौ देखै तळपै भारी। करि किरपा अब लेहु उबारी॥
मैं हूं जीव कछू ही नांहीं, दया करौ हरि अंतर मांहीं॥
टीलौ देखै सोई कीजै। गुर देव जांणि र दरसण दीजै॥