मो पइ कठिन वियोग की, सही जात पीर।

सखी री कोइ उपाय हइ, धरीये मन धीर॥

भूख पिपासा सब गई, भयउ सिथल सरीर।

विरह घाउ हियरउ फटइ, जइसइं जूनउ चीर॥

हुं विरहिणि परवसि भई, जरी पेम जंजीर।

राजुल जिनहरख मिले, भयउ सुख सुं सीर॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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