जा रे मोहन तोसैं प्रीत लगाई, समझ देख मन में पछिताई॥
जे मोहन थानैं ऐसा जाणती, पहली मुचड़को लेती लिखाई।
बैर आंगण में लेती लिखाई, बीच में लेती सिरी गंगा माई।
पहिर तो पैर अणवट बिछबा, सरस चोली चुंदड़ी रंगाई रंगाई।
अतनो पहिर गई मोहन पे, जोबना की ऊंचकी अदा बताई।
अपणी गरज के कारण सांवरो, बैयां पकड़ मोही लपटाई।
गरज निकस गई उन मोहन की, मुखड़े ना बोल्यो अंखियां छिपाई।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, हरि के चरण नित रहूं लिपटाइ।