जोगी जग मैं क्यांन्हैं फिरै, बैसि गुफा मैं ध्यांन धरै॥

साहिब कारणि लीया जोग। तजि बिषिया इंद्री रस भोग॥

आपण देखै दिखांवण जाइ। उलटि अपूठौ बैठै आइ॥

आवत जातां होइ उपाधि। रांम रसाइंन घर मैं साधि॥

गुर दादू यूं कह्यौ बिचारि। टीला रे तूं हिरदै धारि॥

स्रोत
  • पोथी : संत टीला पदावली ,
  • सिरजक : संत टीला ,
  • संपादक : ब्रजेन्द्र कुमार सिंघल ,
  • प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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