जोगी जग मैं क्यांन्हैं फिरै, बैसि गुफा मैं ध्यांन न धरै॥
साहिब कारणि लीया जोग। तजि बिषिया इंद्री रस भोग॥
आपण देखै दिखांवण जाइ। उलटि अपूठौ न बैठै आइ॥
आवत जातां होइ न उपाधि। रांम रसाइंन घर मैं साधि॥
गुर दादू यूं कह्यौ बिचारि। टीला रे तूं हिरदै धारि॥