सखी री घोर घटा घहराइ।
प्रीतम बिणि हुं भई इकेली, नइणां नीर भराइ॥
देखि संयोगिणि पिउ संग खेलत, सोल सिंगार बनाइ।
मन की वात रही मनही मइं, मनही मइं अकुलाइ॥
धन वैयारी प्यारी प्रिउ की, रहत चरण लपटाइ।
मो सी दुखणी अउर जगत में, कहत जिनहरख न काइ॥