गुर कै द्वारै क्यूं कमाइजै। जिहि कौ सदिकौ बैठां खाइजै॥

जीव रंक थैं छत्रपति कीयौ। माथैं हाथ दे सरणैं लीयौ॥

सोच विचार करै जिनि कोई। रांम मानैं भला होई॥

सेवा करी तिनहुं फल पाया। साहिब जी का रिजमा आया॥

गुर दादू साहिब कौ अंग। टीला ताकौ करिलै संग॥

स्रोत
  • पोथी : संत टीला पदावली ,
  • सिरजक : संत टीला ,
  • संपादक : ब्रजेन्द्र कुमार सिंघल ,
  • प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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