काजळ घालो महंदी लावो कंकण हाथ बंधाई
तेल फुलेल उबटणो लावो यूं समझावै माई
यूं समझावै मात रुकमणी कह्यो हमारो कीजै
जिण री कन्या कुळ तैं ढीटी तिण कूं कौण पतीजै
राणी भणै अंबिका पूजण जा बाई ! जात कंवारी
अपणा कुळ री रीत परापर फेरां होय अंवारी
पूगो हुकम नगर रै मांही सखियां सहस बुलायी
खबर भयी चहुं ओर अंबिका जात रुकमणी बाई
भवन-भवन सैं कामण आयी चाली मंगळ गाती
हार-डोर वण्या अति सुंदर देख सभा मन भाती
केसर अगर कपूर छिड़काया चंदण चोक पुराया
वर दे देवी अंबिका ! मोहि कृष्ण सो वर पाया