भाई रे ए, बैरागी ही रहैंगे॥

खांणां खाइ कपड़ा पहरैं, अला अला ही कहैंगे॥

जांहिं कहूं बुलावैं काहू, अैसा किया बिचारा।

साध संगति मांहै दिन काटे, यूं तिरि उतरै पारा॥

अबलि फकीर अलह सूं लागे, जिनि यह कुदरति कीन्हां।

आपा उळटि विचारि रु देख्या, तब इनि आपा चीन्हां॥

जिनि सिरजे तासूं लागे, तौ तुम्ह काहे दुख पाया।

टीला गुर दादू विधि कीन्हीं, साहिब सूं सब लाया॥

स्रोत
  • पोथी : संत टीला पदावली ,
  • सिरजक : संत टीला ,
  • संपादक : बृजेन्द्र कुमार सिंघल ,
  • प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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