आज बिंद्रावन रास रच्यो है, मैं भी देखण जाऊंगी।
सातूं सिंगार करूं मोरी सजनी, मोतीयन मांग भराऊंगी॥
ओढ कसूमल पिचरंग लहर्यो, मोहनलाल रिझाऊंगी।
तारावळ तो तार बजावै, मैं सुरबीण बजाऊंगी।
नरहरि निरत करै हर आगै, मैं ग्वालण बण जाऊंगी।
मोहन डाण दहो को मांगै, कंस को जोर दिखाऊंगी।
इसड़ो रास रच्यो मोरी सजनी, प्रेम मगन होय जाऊंगी।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, जोत में जोत मिलाऊंगी।