रेत रा दो चार कण तो हेत रा हजार,

खेजड़ै री छांवली में प्रीत रो वैवार।

प्राण धन अरपूं थनै रळियावणी धरती

देह री केसर तुली ही ताकड़ी तलवार।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : भगवतीलाल व्यास ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : मई, अंक - 03
जुड़्योड़ा विसै