रात पाछली आंगण-आंगण घटी घमोड़ा खावै,

मूंड झाकलै बाड़ै-बाड़ै टोकरियां घरणावै।

फटकै कान सींगड़ा हालै आळस पूंछ उड़ावै,

नुंवा बाछरू री हेताळू मायड़ कठै रंभावै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : भगवतीलाल व्यास ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : मई, अंक - 03
जुड़्योड़ा विसै