ब्याळू कर जुग रो भागीरथ खेतां माथै जावै।

माटी मुळकै बीज पसीजै हरियाळी लहरावै।

धोरै-धोरै श्रम री गंगा क्यार्‌यां मांही आवै,

काळ्या-पीळ्या रै कांधै चढ़ सुख इंदर मुस्कावै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : भगवतीलाल व्यास ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : मई, अंक - 03
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