ब्याळू कर जुग रो भागीरथ खेतां माथै जावै।
माटी मुळकै बीज पसीजै हरियाळी लहरावै।
धोरै-धोरै श्रम री गंगा क्यार्यां मांही आवै,
काळ्या-पीळ्या रै कांधै चढ़ सुख इंदर मुस्कावै।