कहे दास संग्राम गुरां की महिमा भारी।
कींकर वरणी जाय जीव बुद्धि है म्हारी।
धूजै है म्हारी घणी सुण सज्जन इण घाट।
तौ लौं किण रो द्यूं हं मैं सो हो श्रगुण को थाट।
सो हो श्रगुण को थाट धणी निर्गुण औतारी।
कहे दास संग्राम गुरां की महिमा भारी॥