तातो लोह लुहार को मार हथोड़ा खाय।

हबक्यां चडतो यूं कह्वै देखो अन्याय।

देखो अन्याय, बिरादरी का मारै।

घणी-घणी दे चोट कदे जरा बिचारै

कहतो कवि गोपेश, हुयो यो भूंडो नातो।

अपणा ही दुख देय बोलियो लोहो तातो।

सोनी सुण सोनूं कह्वै सुणजे ध्यान लगाय।

अतरी मत बे कदर कर मत सम्मान घटाय

मत सम्मान घटाय, चिरमली सूं मत तोलै।

काळा मुख की चिरमली म्हारै संग डोलै।

कहतो कवि गोपेश, बात आछी कोनी

कर बरोबर म्हानै कवै सोनूं सुण सोनी।

भाई राम भरत हुया और भाई भाय।

भरत राज नै तज दियो राम दियो बिसराय।

राम दियो बिसराय, अेक नै अेक सरावै।

दोन्यां को भी भायम जस दुनिया गावै।

कह तो कवि गोपश, आज तो सुई कै तांई

गळो काटतो देर लगावै कोनी भाई।

डेरो हुयो उछाव को पाय गुणी सुत अेक

घणा पुत्र के काम का करै अनीत अनेक

करै अनीत अनेक, वंश को नाम डुबोवै

देख-देख कर मात-पिता को हिवड़ो रोवै।

कहतो कवि गोपेश, चांद यो हरै अन्धेरो

नो लख तारा मेट सकै ना तम को डेरो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : गोपीनाथ पारीक ‘गोपेश’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
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