आन देवरा दास घणौ दीखेलो भूंडो।

पति सांमी दी पूठ कियो जारां दिस मूंडो।

जारां दिस मूंडो कियो पति रे साम्ही मूंठ।

जनम जनम करसी थनै संग्रामदास कहै ऊंट।

संग्रामदास कहै ऊंट कूटसी चढ चढ ढूंढो।

आन देवरा दास घणौ दीखैलो भूंडो॥

स्रोत
  • पोथी : रामस्नेही सम्प्रदाय ,
  • सिरजक : संत संग्रामदास ,
  • संपादक : वैध केवलराम स्वामी ,
  • प्रकाशक : स्वामी केवलराम आयुर्वेद सेवा निकेतन ट्रस्ट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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