कहै दास संग्राम ऊंट मत कर अरड़ाटा।

बिना गुन्है ही डंड लाट तो करड़ा लाटा।

करड़ा लाटा लाटतो कह्यो मानतो नांहि।

बड़ा बड़ा दुख देखसी जनम जनम के मांहि।

जनम जनम के मांहि करम कीन्हा है माठा।

कहै दास संग्राम ऊंट मत कर अरड़ाटा॥

स्रोत
  • पोथी : रामस्नेही सम्प्रदाय ,
  • सिरजक : संत संग्रामदास ,
  • संपादक : वैध केवलराम स्वामी ,
  • प्रकाशक : स्वामी केवलराम आयुर्वेद सेवा निकेतन ट्रस्ट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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