हरिचंद सत संग्राम कहै करड़ो घणौ निराट।

कठिण हिया को सांभळे छाती बजर कपाट।

छाती बजर कपाट नरप दुख दीठा भारी।

धर हड़ियो आकास लगी धर धूजण सारी।

सूरज वंस उजाळियो महि पतेरे पाट।

हरिचंद सत संग्राम कहै करड़ो घणौ निराट॥

स्रोत
  • पोथी : रामस्नेही सम्प्रदाय ,
  • सिरजक : संत संग्रामदास ,
  • संपादक : वैध केवलराम स्वामी ,
  • प्रकाशक : स्वामी केवलराम आयुर्वेद सेवा निकेतन ट्रस्ट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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