मिनखा तन दीन्हों तनै भौंदू भज रे पीव।
बैठो क्यों संग्राम कहे ऊंडी देने नींव।
ऊंडी देने नींव हिया फूटेड़ा गहला।
कर आगानी ठौड़ अठै कुंण रहवण दैला।
चौराशी लख जूण में रुळियो फिर सी जीव।
मिनखा तन दीन्हों तनै भौंदू भज रे पीव॥