कहे दास संग्राम गुरां की महिमा भारी।

कींकर वरणी जाय जीव बुद्धि है म्हारी।

धूजै है म्हारी घणी सुण सज्जन इण घाट।

तौ लौं किण रो द्‌यूं हं मैं सो हो श्रगुण को थाट।

सो हो श्रगुण को थाट धणी निर्गुण औतारी।

कहे दास संग्राम गुरां की महिमा भारी॥

स्रोत
  • पोथी : रामस्नेही सम्प्रदाय ,
  • सिरजक : संत संग्रामदास ,
  • संपादक : वैध केवलराम स्वामी ,
  • प्रकाशक : स्वामी केवलराम आयुर्वेद सेवा निकेतन ट्रस्ट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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