मिनखा तन दीन्हों तनै भौंदू भज रे पीव।

बैठो क्यों संग्राम कहे ऊंडी देने नींव।

ऊंडी देने नींव हिया फूटेड़ा गहला।

कर आगानी ठौड़ अठै कुंण रहवण दैला।

चौराशी लख जूण में रुळियो फिर सी जीव।

मिनखा तन दीन्हों तनै भौंदू भज रे पीव॥

स्रोत
  • पोथी : रामस्नेही सम्प्रदाय ,
  • सिरजक : संत संग्रामदास ,
  • संपादक : वैध केवलराम स्वामी ,
  • प्रकाशक : स्वामी केवलराम आयुर्वेद सेवा निकेतन ट्रस्ट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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