छंद पाघड़ी

बळिपति जइति वावाड़ि बालि, ढोइया थाट वाजतंइ ढालि।
आरम्भ राम जइतसी अत्ति, आवियउ मीर सिरि आधरत्ति॥

धूधाहर सामी सेन ढोइ हइवइ हळि हुई होइ होइ।
मुहमद नाम जम्पिय मुहांह तेग गहि ऊठिया मीर ताह॥

ताणिय कमाण कनाढ तूंग, बाणाउळि ऊडिय लोहि बूग।
जइ राम जंपिय हिंदू जणेहि, घातिया ताम घोड़ा घणेहि॥

राठवड़ि रोळि रेवत रग्घ, विच्छूट जाणि संगळी वग्घ।
पतिसाह सेन हुअतइ पगेहि, माथइ असि चाडिय मारुअेहि॥

वरकीइय तेजी नाळि विज्ज, भाइअे किया भेळा भडिज्ज।
सागुलइ राग वागा संमोहि, लाखियउ तुरी सामहइ लोहि॥

संग्रामि धीरि सामहइ सारि, मेल्हियउ तुरी मोगर मंझारि।
जइतसी राइ मच्चावि जंग, अम्मलीमाणि टाळिय न अंग॥

रेवत घालियउ जइत राइ, नवसहस घणी क्रनह नियाइ।
खेड़ रइ राइ खोहणि खंधार, ढोयउ सरूप वाजती धार॥

दळि दाणवि जइत सरूप दीठ, नेठाहि धीरि नाखिय नित्रीठ।
हिंदुआ तुरक्का हुबिय हक्क, कारिमाळ वाजि कळळिय कटक्क॥

पडियाळ धूणि पउरिस्सि पूरि, गाजणइ तणइ पइठउ गरूरि।
खुरिसाण विवाणे खेड खागि, वाजिया घाउ ऊडी व्रजागि॥

खाफरा जइत वाहइ खडग्ग, वासदे जणि वने विलग्ग।
ऊतरा सेनि जइतउ अबीह, सीधरे पईठउ जाणि सीह॥

कूंभाथळ भांजइ मीर कंध, ऊकुरुड चडइ दळ अनिबंध।
आवद्धि टोपि ऊभरी अग्गि, खीटिया थाट वेवे खड़ग्गि॥

गहगहिय थाट बेऊं गरीठ राठउडि रउद्रि वाजियउ रीठ।
सूरा सधीर वाजइ सरोस पडिकाळे ऊडइ जिरहपोस॥

राठउड़ा हाथे रिम्मराह, संगरइ मीर सहिता सनाह।
जरदाउळि फूटइ सेल जीह अरि उर अणी ठलइ अबीह॥

घण घाइ मुगुल्ला घडिय घट्ट रहचिवा थट्ट हुइ आहरट्ट।
सेलार सहइ सारीर सार भाले भंभार पट्ट पहार॥

ताइयां तणे वाजइ तियग्ग, ऊतरइ गात हूंता अलग्ग।
राठउड़ विढइ रिणि रस लुद्ध, सारे मुगुल्ल हुअइ बि विसुद्ध॥

अइराळि अणी पाया अठाहि, मतवाळा घूमइ मीर माहि।
वाहइ खड़ग वेसे विरत्त, रिणठाह रत्त आवद्ध रत्त॥

रउद्र दळ रहच्चइ जइतराउ, होहू कि मह वाजइ हुलाउ।
ताइया उरे द्यइ कूत तेह, मारुअड राउ मातउ कि मेह॥

धड़हड़इ ढोल धूजइ धरत्ति, पडियालुगि वरसइ खेड़पत्ति।
वीकाहर राजा इंद वग्गि, खाफरा सिरे खिविया खड़ग्गि॥

पतिसाह फउज फूटंति पाळि, ब्रहमण्ड जइत गाजइ विचाळि।
अम्बहर जइत वरसइ अवार, धुटु किया मीर मुहि खग्ग धार॥

सार जळ मेछत सहइ सक्कि, करिमाळ क्राह पडियउ कटक्कि।
धूधहर वरसता धन्न धन्न, गुरिजां निहाइ वाजइ गिगन्न॥

खुरिसाण सीसिबाजइ खड़ग्ग, ऊभरइ बूर आकासि लग्ग।
वेढ़तां विलम्बइ वात वार, धउसिया मीर मुहि खग्ग धार॥

मरदिया जैम जगमल्ल मल्ल, ढण्ढोळि ढल्ल मारिय मुगल्ल।
रळतळइ रत्त सोखइ सपत्त, सम्भळइ सत्त विसथरइ वत्त॥

अणिअे असत्त पूरिया पत्त, तिम छडइ गत्त साळि जिम सत्त।
राठउड़ राह सेलार साह, गळबाह घाति भंजइ गडांह॥

रड़बड़इ रुण्ड खाडे विखण्ड, ताजिया तुण्ड पडिया प्रचण्ड।
सइधणी भोमि वाहरु सीत, देवता राउ पाडउ दईत॥

स्रीराम जइत सारे निसंक, लोहड़े लसक्कर लियइ लंक।
राठउड राउ गळवळइ रोम, वायणउ विलागउ जाणि वाम॥

आहणिय अेकि असिमरि उलाळि, पहटिया बिया गमिया पयाळि।
पारूठे पाजे किय पहारि, मारिया मेछ वाजिन्न मारि॥

गोरिया तणा गाळा ग्रहाह, वड्डावि आइ वाळी विचाह।
गाळउ गळाह मोखावि गाइ, राजवी जेम राठउड़ि राइ॥

चउंडाहर सामी कूति चाडि, ऊतरा सेन नाखिय उपाडि।
झूलाळा किया झाडि झाडि, मोटा ग्रह मोखी मारुआडि॥

संघारि मीर मूगळां साख, लाहउरि गयउ खेरावि लाख।
मुरधरा बधिय उछव मण्डाण, सिवहरिय गयउ घरि खुरासाण॥

कळस

पातिसाह परभव्विय अम्ब उतारि अभगा,
कहं गिडावि गोमट्ट ताडि आंठुअे तुरगा।
कहं समीर मइमत भोमि लोटइ घाइ भरिया,
कहं हडहडइ तुरंग अंग असमरि ऊतरिया।
काबिली थट्ट दहवट्ट किय, वीकाहर राइ वधरु,
जइतसी प्रवाहडउ किय जमा, जाम सूर ससिहर जरू॥

स्रोत
  • पोथी : छंद राउ जइतसी रउ ,
  • सिरजक : बीठू सूजा ,
  • संपादक : मूलचंद प्राणेश ,
  • प्रकाशक : भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै