अइ अइ अलेख भेख केते ज्याहा भ्रमै।

जळ सज्या सिवरूप कमळ किये नाभि ब्र मै॥

ब्रह्मा थियै विभ्रंम पेखि महणारंभ पाणी।

तप तप हूंता तरण बोलि आकासाह बाणी॥

तप धरै त्यार अद्भूत में सहस कोटि लागा बरस।

बैराट घाट पाह पलब दीधी त्यार निधी दरस॥

अप्प दि अप्प उच्चारि आदि थट्टै नारायण।

वेद भेद विस्तारि पकिर लोकेस परायण॥

कीट भ्रंग जिम किया च्यार मुख वेद उचारा।

विस्व मंडळ विस्तारी करण कीध करतारा॥

उण कीध मंडै दीसै यता धरा सीस बासिक धरै।

रिव करै दिवस रजनी’र चंद सकळ देव दाणव करै॥

देवा नै दाणवा द्वंद आदेर जुगादे।

वरण कवण वरणवै वरण देवा अनुवादे॥

असुर जिता ऊपनै तिता धरिया अवतार।

भार करै भव सीस तिताही बार उतार॥

सत जुग जुग त्रैता सुथिर धुर द्वापर लग यम धरै।

कळि जुग करै चवथै कळा करि हिंदू मेछह करै॥

देवां नै दाणवां तेमि हिंदू तुरकाणा।

चित्रगढ दिल्ली चाव सरव राणा सुरिताणा॥

गहलौतां चगथवां सार बधै समजत्ती।

आप आप मग परै बाज जे करै बिरत्ती॥

नरनाथ सहसना जिसै करणि रहस पूजै कही।

जिण मुख सुरह मद संचरै जवन मुख्ख जोवै नहीं॥

कळंकी वत राइया जिया केदार कळाकळ।

पापी जिया पिराग जिता मदवा गंगाजळ॥

हत्यारा हिंदुवा तेता बाणारस।

आस ऊपादध पुणै मुणै पीरव समदारस॥

सुरताण गहण मोखण सदा आतपत्त सिर उल्लहै।

राजसी विरुद हम्मीर का कवि महेस बरणन कहै॥

महि मंदळ मेवाड़ जिका दस-सहस सु गाम।

बरण च्यार सुख बास धरनि साद धाम॥

विकट अनड़ बेछाड़ जूह जंगळ वन जेते।

जळ पग पग ऊजळा तिहुं रति साख तेते॥

आलंब सुरह देवा द्विजां परम सरूप परस्सिय।

राजसिंघ राण भूतेस रुख दोय यकलंग दरस्सिय॥

नगन नगन प्रति नगन तिनहि अंतर सळिता सर।

पिखि करत किलौळ अरुन सित बिबधि वर॥

चक्रवाक सारस विसाळ जळ काक जीवत्त।

आडि ढक बक अनंत कुरज तट हिक यत उत्त॥

उपकंठ तरन अति सघन वन नलन नलन जळ सीत बहु।

कळिराय इंद्रपुर ते कलित कपौत कंठमनि मोर कहु॥

तट तटाक सैबाल जाळ पखी परि डोलत।

जळ उज्जळ भासत्त भूमि लहरी व्या बोलत॥

कबहुं नीर तट परसि उदधि सबद उपजावत।

कमळानाळि पतकपत जात बहौ सो फिरि आवत॥

समीर संग अनुसरत रौ निज येकत सोऊ निरत।

जिस कौऊ सजन अति सजन कौं पहुंचायर पीछौ फिरत॥

सत सळित नेत्र नकुळि विमळ जह वाल बिछतं।

कहु दळ दळ कहु पंक करी कहु तीव्र छित॥

करत ग्राह कहु केलि तिरत कच्छप त्वविय।

कहु वन नागिन नाग कलभ ले कै संकुटविय॥

पय पियत अव छंटिस अनंत कमळ पत्त पूगन करत।

नहिं आवत स्वास समीर तै मंद मंद गति अनुसरत॥

छंद वेलि भुजंगी

कहू गज कपोल मंजै संवारे। कहु लेत है बहौ करनीन लारे॥

कहू नीर उछारि सूंडे उछारे। मनौ सीस मोती कढै तिंवारे॥

कहू रौद ढाहत छाया विरोधै। कहू सूधि हथनीन की गाज सोधै॥

कहू ब्रद के बीच ठाढै बिलासै। कहु मूल राजीव काढै हुळासै॥

कहूं द्वार वाराह पीवै विरोधै। धरा दाढ तै मोथि कै दंत खोधै॥

भय सिंघ कै आवत सब भज्जै। जहां येकलौ बैठि कै आप गज्जै॥

कहू बाघनी बाघ छौनान लीयै। पय घाट विघाट तै आनि पीयै॥

गिर शृंग जा तै परै नीर धार। गत ऊछटै ऊचरै यो अपार॥

जल जरजर सीकर तैं बखानं। जहां श्रम तै ऊपजै स्वाद जान॥

कहू कुंड नीकै भरै वारि पूर। हरी दूर्वा लेत नीके हिलोर॥

कहू भीलनी भील गुंजा समेटै। दरी ग्रेह जामे सिंघ लेटै॥

कहू न्रत केकीन मंडै सुन्यारे। पर कप तै पूछ के छत्र धारे॥

कहू भ्रंगनी भ्रंग के ससोही। मनौ भ्रंग के मोह से रंभ मोही॥

कहू भ्रंगसाखा सो साखा हिलावै। द्रुम येक तै कूदि येक आवै॥

लगै उद्र तै डाभ डारी लाबे। फल तौरि चख्खै केई डावे॥

कहूं सांभर नीलगाय कहीजै। कहूं आरनै ढक तै कप भीजै॥

कहू गज्ज सा पाय आवत गैंडा। वन धूजि प्रथी सूं धावत वैंडा॥

कहू चीतळा मारि भखत चीता। करी नख्ख तै खंड विहंड कीता॥

कहू जाति जामोद की जीति गावै। उनै मेद तीके घिसै केस आवै॥

कहू सिद्ध गिर किन्नरां मद्धि सेवै। दिढ ध्यान लग्गैत आनंद लेवै॥

कहू संग नारीन स्नान क्रीड़ा। वसन जहां मूकि मुखेति व्रीड़ा॥

रिखं अंजुली देत सिंध्यात वधै। जिन वसन पत्र भोजन कधै॥

वन व्रनन प्रवत कीध वारू। सोये अप्पनी अप्पनी बुधि सारू॥

स्रोत
  • पोथी : बिन्है रासौ ,
  • सिरजक : महेसदास राव ,
  • संपादक : सौभाग्यसिंह शेखावत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान राज्य प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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