छंद

 

सुरपति हु प्रसन संमप मति सरसति,
दे मति गणपति वयण वृति।
पति भुयपति सूर उच्चतापति,
पह वाखाणं खेड़-पति॥

महि रूपक सूर रूप-कुळ मंडण,
रूप चडावण नर नयण।
रूप छतीस वंस रासावत,
भूप रूप तीजै भुयण॥

भंजण कवि रोर तिमिर भर भंजण,
गढ़ वीकमपुर उदयगिर।
वड़िम संपेख जगत खित वंदै,
सूर जिगमिग जगत सिर॥

मोटिम अणडोल सतोल मोटमन,
पख जे मोटा पाट पति।
मोटा विरद बहै सूरजमल,
त्याग ख्याग मोटै तखति॥

कमधज जयचंद धूहड़ां कान्हा,
सीह रयण गिरवहण छळ।
अज सूर सोनिगां ओपम,
छाडां तीडां वंस सकळ॥

तिजड़े उथल माळ सुरताणां,
सोभित जैत वीर सत्रसाळ।
मोटां पहां सळख कुळ-मडंण,
मोटम चाडै सूरजमाळ॥

रिण वहण गोग जैसंघ देव रज,
सुरिंद चोंड राव सुकाळ।
विढ़ण दियण दिन तणा वीरम,
छळ निरवहै सूर छाताळ॥

अरड़क रणधीर सहसमल अजमल,
भोत सता राजधर सभाय।
रामां पूनां कान्ह रिणमलां,
चूंडा सूर रूख खग चाय॥

मंडलिकां पातां नाथ मांडणां,
वैरसलां कांधलां वडाळ।
सकतां हापां भाखरां सूजां,
अखां लखां रूपां उजवाळ॥

अड़मालां बालां जगड़ ऊधरां,
भड़ डूंगर चांपा क्रन भूप।
जग भल रूप सायरां जोधां,
रासाउत रिणमालां रूप॥

सूजा बरसंघ नीबा दुरजणसल,
सातल कमां रयण सिवराज।
वीदा जोग भारमल वीका,
उजळा सूर जोध सहि आज॥

वीसा घड़सी मेघ केल्हण वहि,
राजा नरा करण राजांन।
सक असमांन त्याग खग सूजो,
वीका वंस चढा़ वै वांन॥

सूरजमल राम प्रताप रतनसी,
जगि तेजसी करमसी जैत।
वैरा किसन रूपसी करन वंस,
वांन वधार सूर वांनेत॥

माला अचळेस भीम पूरणमल,
कान्ह मान सिर रंग कलियांण।
सुरजन संघ कमां ठाकुरसी,
भामी जैत सूर कुळ-भांण॥

सुरतांण प्रथंम गोपाल रामसंघ,
अभंग भांण राघव अमर।
असमर कर रासउत उजाळो,
हुवो सूर कलियाणकर॥

पह वीकमनयर ऊदगिर ऊपर,
सूर सहसकर सह सबळ।
मेघाडंबर छात्र मांडीजै,
छत्रपति सूर वहै छळ॥

रायांगुर सु जंगळू राजा,
दुनी कळह गुरु गुरु दातार।
सूजो गुरु तेरहां साखां,
रूप छतीस वंस संणगार॥

वाचा सत सील पमांण जांण विधि,
खत्र धरम प्रवीत त्याग।
सूर बड़ां ही बड़ो खड़ग-सिध,
जस पारख जोवतां जाग॥

लहरी दन वरस जग रेळण,
प्रसिध अडिग मोटिग अणपाळ।
अरहट अवर पहइ न सरगि रयन,
मेर महण घण सूरजमाळ॥

छाया क सुगंध निवास अचळ छति,
पुनहि मरन नर दान पडूर।
इन अदभुज सुज सुज सुज भूप अनेरा,
श्रीखंड अंब कल्पतरु सूर॥

इळ कुळ आचार भार उपाड़ण,
वडिम निरवाहण जस वयण।
धरपति अवर जोवतां मणधरि,
सूर विरद घण सहसफण॥

दळ रूपक सूर सुयण घण दाता,
सत सूरातन पवित्त सरीर।
अधिपति अवर मदार ईखतां,
खेड़-सुपह खित सागर-खीर॥

भव पातग रोर दळिद जाहि भाजे,
करता दान सनान कळ।
जळ नदि अवर अवर नर जा मळि,
जगि सूरजमल गंग-जळ॥

सूरजमल तणीं हुवै कुण समसर,
पह पोरिस क्यावर पसर।
तण कथीर काच इम भुयपति,
हेम हीर नग जैत-हर॥

जोधहर तणीं हुवै कुंण जाभलि,
जग पुड़ करतां त्याग जुध।
पंख बग संख बिनां बीजा पह,
सूर गरू हंस वंस सुध॥

जस पारिख चोत पवीत जोवता,
रीत त्याग ख्याग राठोड़।
ओण पाण पंड भूप अनेरा,
मुरधर सुपह सूर सिरमोड़॥

संसार प्रसाद वाद पारिख सुज,
फेर पखै जोवतां फेर।
बह कमठांण थंभ पह बीजा,
सूर कळस धज तास सेर॥

मुर मेक छतीस असी च खटु मुर,
दह चित दोय सोळह घण दांन।
वेद नाद रूपक व्याकरण,
पहर विर्भद कवि दा पुरांण॥

पिंगळ संगीत संस्कृत प्राक्रत,
कोक भरह रस कळा कमंध।
रस भागवंत भाख खट् जस रस,
बह बूझगर सूर प्रबंध॥

जस किरण पसर अंतर जोवंतां,
धरपत बिदवर खड़गधर।
नर वै अवर नखत ससिहर नर,
सूरज सरूपदे सुवर॥

धर पूरब पछिम दखिण ऊतर धर,
नर वै नर जोवतां नरिंद।
रायां रूप भूप सुह राजा,
वडहथ सूर सरूपदे विंद॥

सायर धर अंबर सूर गिर ससिहर,
जग नर अमर अचळ ध्रु जांम।
रिख जख सेख बंभ हरि इंद्र रुद्द,
तूझ प्रताप सूर लग तांम॥

॥इति महाराजा श्री सूरसिंघजी री वेल सम्पूर्ण॥

स्रोत
  • पोथी : ऐतिहासिक वेलि-संग्रह ,
  • सिरजक : गाडण चोला ,
  • संपादक : डॉ. नारायणसिंह भाटी ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै