चौपई

आलमसाह चड्यउ सुरताण, कटक सहु नइ हुवा फुरमाण।

मोटा खान भारी ऊंबरा, तिणि गढि लागा पालाफीरा॥

कनड़ा कुर्कट हवसी जेउ, कोसीसइ जइ वाज्या तेउ।

मीर मलिक पठाण जि हुता, तिणि गढि चढ्या घणा सुंजुता॥

चउद सहस गयवर तिह गुड़्या, मदि माता भाखरि जाइ अड़्या।

घंटा तणा हुवइ निनाद, गढना देव धरइ विपवाद॥

सवालाख वाजा वाजीया, कायर तणा तिणि फाटइ हीया।

लबे लबे करइ इआर, जाणे गढ लेसी तिणिवार॥

दूहा

तिणि अवसरि हम्मीरदे, तेड़्या सगळा राइ।

आजि भलउ कीलउ करउ, देखइ जिउ पातिसाह॥

राजकुली छत्रीस नइ, मोटा राणो राणि।

ते गढ हूता ऊतर्या, जझ करइ मंडाणि॥

सूरा मनि उछाहड़उ, कायर पड़इ पराण।

बाका बोलजि बोलता, भाजि गया तिसि ठाण॥

पछेवड़ी घुटी समी, हाटो माहि धसंति।

लोह झबक्या देखि करि, गया ति कायर न्हासि॥

चौपई

सात छत्र धरावय राइ, गयवर गुड़्या आण्या तिणि ठाइ।

आलम ऊभो देखइ पातिसाह, बेऊ सुभट भिड़इ तिणइ ठाई॥

बिहु दल वाजइ जांगी ढोल, नीसाणे पड़इ हिलोल।

बिहुं दलि वाजइ रिणि काहली, कटक दउड़ी झालरि रसि भरी॥

अति मीठी बाजइ मूहरी, तियरइ नादि वीर रसि चड़ी।

बिहुं दलभाट करइ जयकार, सुभट भिड़इ लाभइ पार॥

झबझब झबकइ तिह करवाल, वाहइ सेल घणा अणियाल।

सींगणि तणा विछूड़इ तीर, इम मेल्हइ भिड़इ तिम वीर॥

यंत्र नालि वहइ ढींकुली, सुभट राय मनि पूजइं रली।

मरइ मयंगल आवटइ अपार, आहुति लइ जोगिणि तिणि वार॥

गयवर पड़इ हिंवर हिणहिणइ, सुभट घणा रिणांगणि पड़इ।

लहता ग्रास घणा जे जिहां, तेउ उसंकल मांगइ तिहां॥

दूहा

उलगाणा खायइ सदा, ऊरण हुइ इकवार।

चाड घणी ठाकुर तणी, सारइ दोहिली वार॥

डील बड़इ लहता सदा, न्यामति घोड़ा ग्रास।

गढि गो ग्रहि उरण करइ, त्या सुरगापुरि वास॥

चउपई

पातिसाह दल भागौ नाम, मार्या मीर मलिक बहु खान।

गढ (नइ) पूजा कीधी अति घणी, जयति हुइ रिणथंभोरह धणी॥

सहु कटक री कीधी सार, सवालाख खूटउ एकवार।

सहु मलिक खान करइ सलाम, कटक मरावइ साहिब कुण काम॥

प्राणइ गढ लीजइ नवि किमइ, कोई उपाय चिंतवउ तिमइ।

जइ रिणि पुरावइ खुंदकार, हेलां गढ लीजइ इक सार॥

रिण थंभ ऊपरि चड्यइ सुरताण, देखइ गढनउ सहु मंडाण।

सिंघासणि सउ बेठउ राउ, रिण हुंतउ जोवै पतिसाह॥

महिमासाह कहइ सुणि राउ, मो घातइ आयउ पतिसाह।

कहइति डील मारउ सुरताण, कहइति पाड़उ छत्र मंडाणि॥

राउ कहइ थारउ साचउ मीर, छत्र पाड़ि इसउ कहइ हमीर।

कहइ पठाण सुणि गोमरा, इणि जीवति किउ भूंजिसि धरा॥

खांचि बाण तिण मेल्ह्याउ मीरि, सात छत्र तिणि पाड़्या तीरि।

चिति चमकिउ आपु सुरताण, महिमासाह तणउ पराण॥

पहिलउ रिण पूरउ लाकड़े, देई आग बाल्यउ तिय भड़े।

कटक सहू नइ हुयउ फुरमाण, वेलू नखाउ तिणि ठाणि॥

सुथण तणी बाधइ पोटली, मीर मलिक वेलू आणइ भरी।

करइ कोइ झूझ गढ वाल, वेलू आणइ सहि पोटली॥

छठइ मासि संपूरण भर्‌यउ, ते देखी लोक मनि डर्‌यउ।

कोसीसइ जाइ पहुता हाथ, तुरका तणी समी छइ बाच्छ॥

राय हमीर चिंतातुर हूयउ, रिण पूर्‌यउ दुर्ग्ग हिव गयउ।

गढ देवति लही परमाथ, आणी कुंची दीधी हाथि॥

राय बारी उघाड़ी ताम, देव माया पाणी वहिया ताम।

वहि वेलू पाणी सुं गयउ, तेह झोल वलि ठालउ थयउ॥

राउ आगलि नितु पालउ पड़इ, देखी पातसह धड़हड़इ।

धारू वारू नाचइ बेऊ, पुठि दिखालइ पातिसाह नइ तेउ॥

कोई कटक मांहि भलउ मीर, नाचणि मारइ मेल्हइ तीर।

जइ हुवइ महिमासाह नउ कोइ, इय विदां तणि मारइ सोइ॥

सारी दुनी मांहि को इसउ, इय विदां तणि मारइ जिसउ।

महिमासाह नउ काकउ होई, एअ विदा तणि मारइ सोई॥

इयणा घरनी विद्या एऊ, भला मीर नवि जाणइ तेऊ।

ढीली मांहि वंदि तुम्हि धर्‌यउ, तउ खिणि आणि ऊभउ कर्‌यउ॥

तुम्हनइ निहाल करउं बड़ा मीर, इय विदां तणि मारइ तीरि।

साहिब सिंगणि वाण्या हाटि, सवालाख अडाणी माटि॥

सिंगणी घणी भली द्यइ हाथि, सींगणि खाची कुटका सात।

आणावी सिंगणी सुरताणि, मीरा नइं अति चड्यउ पराण॥

राव आगलि तव मांड्यउ नाच, धारू वारू नाचइ पात्र।

तोड़ी ताल पुठि फेरी जाम, मलिक मीर मारी ते ताम॥

एकइं तीरि पात्रि मारी बेउ, गढ बाहरि मारी पाड़ी तेऊ।

घणउ उचिति दीधउ सुलताणि, एउ पवाड़उ कीधउ तिणि ठामि॥

गढ गाढउ विंट्यउ सुरताणि, को सलकी सकइ तिणि ठामि।

माहो मांहि मरइ लखकोड़ि, पातिसाह नवि जाए छोड़ि॥

बार बरस नउ विग्रह कीयउ, मीर मलिक घणा तिह मुवा।

ढीली थी आई अरदासि, किसइ लोभि साहिब रह्याउ वासि॥

संइभरिआल मानइ आण, दंड नवि द्यइं तुझ नइ सुरताण।

गढ नवि लीजइ प्राणइ किसइ, कटक मरावीइ कारण किसइ॥

थारइ गढ छइं आगइ घणा, घर संभालि साहिब आपणा।

पुत्र कलत्र सहुअइ परिवार, तीयारइ मेलउ दइ खुंदकार॥

साहिब कहइ सुणउ सहु मीर, नाक नमणि जे देइ हमीर।

घरि जातां सोभा हुइ घणी, पति पाणी रहइ आपणी॥

पातिसाह कहावइ ईम, बार बरस विग्रह नी सीम।

मोटउ अगंजित राव, सरणाई तणउ पतिसाह॥

बार बरस आपे रामति रमी, मुनइ घरि मुकलाविनइ किमइ।

हुं थारइ आव्यउ प्राहुणउ, मुहत देइ मो दे ताजिणउ॥

दूहा

पातिसाह इसउं कही, गढि मोकल्या प्रधान।

रामचंदि रूड़उ कीयउ, लोक कहइ चहुआण॥

आलम साह रइ आगलइ, तुं ऊगर्‌यउ अभंग।

खिजमति देइ बउलावि नइं, जेम रहइ अतिरंग॥

लोक कहइ चहुयाण नइ, ईम विमासी जोई।

मोटा सुं नमता कदे, दूषण नावइ कोई॥

घणउ विसास जिहां तणउ, ते तेड़्या राय प्रधान।

रणमल रायपाल सूरिमा, मोकलिजइ तिणि ठाम॥

कवि कहइ ‘भांडउ’ इसउ, संभलिज्यो सहु कोई।

ते प्रधान जं करइ, अचरिज जोवउ लोई॥

चउपई

राय हमीर मोकल्या प्रधान, रणमल रउपाल गया तिणि ठामि।

पातिसाह नइ कीया सलाम, आलमसाह दीयइ बहु मान॥

रणमल तीरइ पूछइ पतिसाह, तुम्ह नइ ग्रास किसु दे राउ।

अरधी बूंदी अह्यानइ दइ राउ, जिमणइ गोड़इ बइसारइ पासि॥

सइ हथि बीड़उ अम्हनइ दइ राउ, गढ प्रधानउ करां पतिसाह।

तउ तुम्हि आव्या बड़ा प्रधान, घर मुकलावउ अम्ह नइ देइमान॥

बार बरस तइ विग्रह कर्‌यउ, गढ लीया विणु कांइ पाछउ भयउ।

रिणमल राइ (पाल) कहइ सुरताण, बंधव गढ नवि लीजइ प्राणि॥

पूरी बूंदी द्ये सुरताण, अम्हे गढ द्यउ (तुम्ह) विण प्राणि।

सुणी बात हरख्यउ सुरिताण, लिखि इहां दीध तिहां फुरमाण॥

अम्ह तुम्ह विचइ अलख रहमाण, कोस क्रीया करइ सुरताण।

बीजा ग्रास द्यउं अति घणा, बांह बोल तु दीउ आपणा॥

मति भूला नहीं तीय मान, तियां मुरिखानी नाठी सान।

हीया सूना जाणइ नहीं ईम, तुरकां नइ वेससिजइ केम॥

स्वामी-द्रोह कीयउ तिए तिहा, परिघल ले आवां छां तिहा।

मनि हरख्या रिणमल राउपाल, कूड़ करी गढि ग्या ततकाल॥

राय हमीर पूछयउ (छइ) इसउं, पातिसाह मांगइकहि किसउं।

देवलदे मांगइ कुंवरी, द्रोहे बात मनि हुंती कही॥

देवलदे (इ) कहइ सुणि बाप, मो बड़इ ऊगारि नि आप।

जाणे जणी हुंती घरे, नान्ही थकी गई त्या मरे॥

राय हमीर सुधि नवि लहइ, सहु परिघउ फेर्‌यउ तिणि समइ।

गढ नउ लोक जाणइ भेउ, रणमल रायपाल करइ छइ तेउ॥

कोठारी नइ बोल्यउ विरउ, धान खावि सहु तउं परउ।

अम्हनइ बूंदी पूरी हुई, तं परधानउ देस्यां सही॥

तिणि नीचि नाख्या सहुधान, रिणमल रउपाल परधान।

वीरमदेरी घालइ घात, राय तणइ मनि वसी बात॥

रिणमल रउपाल मांगइ पसाउ, एकवार परघउ द्यउ राउ।

कटकि कीलउ करां अति भलउ, जे में तुरक पाड़ा पातलउ॥

राय तणइ मनि नहीं विशेष, द्रोहे कीधउ काम अलेख।

सवालाख परिघउ (द्यइ) रावु, द्रोहे मिल्या जाई पतिसाह॥

सात वार पहिराव्या तेउ, मूरख हरख्या गाढा बेऊ।

कोसीसे थीयउ देखइ राऊ, जोवउ रणमल खेल्यउ डाव॥

अणचिंतइवी हुइ कुण बात, दसा देवि दीधी अति घात।

पापी परधान पहड़्या बेउं, परिघउ सहु लोपउ तेउ॥

गढ मांहि नहीं को जूझार, जइरइ हाथि दीजइ हथियार।

वांकउ देव तणउ विवहार, जीती कोई जाई संसारि॥

दूहा

तइ गढ पुठि दीध मूं हउं, तुझ पूठि देसि।

कीरति नारी वरि जि मइ, आज प्रमाण करेसि॥

मउड़उ वेगउ मरण छइ, सहुकिण नइ संसारि।

‘भांडउ’ कहइ राजा निसुणि, कलि मांहि बोल ऊगारि॥

गढि गो ग्रहिय मरइं जिके, तिया रइ मोख दुवार।

अवसरि मरइ हमीरदे, नाम रहइ संसार॥

अवसरि जे नवि ओलखइ, नीभागीए नरेह।

‘भांडउ’ कहइ ते भीखिया, लहिसिइ नहीं वलेह॥

लोक सहु तेड़ी करी, पूछइ राउ चहुयाण।

हुं ठाकुर थे प्रजा थां, वउलावुं किणि ठाणि॥

हमीरदे थारा अम्हे, सात प्रियां लगु लोक।

इणि वेला जे पुठि द्यां, जणणी जाया फोक॥

जा जा तुं घरि जाह, तुं परदेसी प्राहुणउ।

म्हें रहीया गढ मांहि, गढ गाढउ मेल्हा नहीं॥

जाजउ कहइ ति जाउ, जे जाया तिह जण तणा।

अरथ विडाणा खाइ, साईं मेल्हइ सांकड़इ॥

जाजउ कहइ (ति) राजा निसुणि, अवसर जेम लहेसि।

तइं मरतइ गढ भांजतइ, कलि मांहि नाम करेसि॥

भाई भणी मइं भगतावीउ, तुं महिमासाह हमीर।

देव सूत्र ईसउ हूवउ, वउलाऊ कहि मीर॥

ईण वचनि झाखा थई, बोलइ बेऊ मीर।

अनरथ अणहूंतउ करी, जउ जाहं कहइ हमीर॥

म्हां दीधां जइ ऊगरइ, तउ तूं गढ ऊगारि।

मीर कहइ हम्मीर दे, अनरथ हुतउ निबारि॥

मनि मच्छर अधिकउ धरी, बोलइ राय हमीर।

डील वड़इ सुरिताण नइ, आपिसुं? बेउं मीर॥

महिमासाहि इसिउं कहइं, निसुणि राय हमीर।

धान जोवाड़ि कोठार नां, गढ राखा तउ मीर॥

कोठारी राय पूछियउ, केता धान कोठारि।

वणिठेइ वाणियइ देखालीया, ठाला लेई अंबार॥

वस्तु

राउ चिंतइ राउ चिंतइ मनह मंझारि।

गढ गाढउ पहड़ीयउ, घणउ द्रोह रणमल कीधउ।

समउधान तूटउ तिहां, अति दु:ख कोठारी दीधउ।

वेगि वेगि जमहर करउ, कोई मालावउ वार।

पटराणी राजा वीनवइ कुलनउ नाम उगारि॥

चउपई

वीरमदे नइ राजा कहइ, तूं नीकलि, जिम वंसज रहइ।

वीरमदे कहइ सुणि वीर, तूं मेल्ही जाऊं हमीर॥

साची बात मानी चहुयाण, कुमर तेड़ाव्या तेणइ ठामि।

टीलउ काढि खड़ग दीधउ हाथि, रिणथंभोरि वड़ा हुजउ हाथ॥

बांभण नइ तुम्हि देज्यो दान, रखे महेसरी करउ प्रधान।

महेसरी ना वाढिज्यो कान, तुरकां ने देज्यो बहुमान॥

राय सिखावणि दीधी भली, तीयांरी माइ साथि मोकली।

तीह नइ घोड़ा दे रजपूत, दियइ बाप वली दुइ पूत॥

राय हमीर मीर नइ कहइ, हाथी मारि रखे कोई रहइ।

मेल्हइ मीर प्राण अति बाण, नव नव हाथी पाड़इ ठाण॥

सालिहोत्र सूधा तूषार, ते मारीजइ तेणइ वार।

घरि घरि जमहर लोके कीया, राऊल गुन बलइ छइ तिहा॥

जमहर रा माता धूंकला, राय अंतेउर लागा बला।

करी सनान पहिरीया चीर, ऊगटणे लूहीया सरीर॥

सिरि सिंदूर सिंध तेड़िया, सवा कोड़ि का टीका किया।

नयणे काजल सारी रेह, मुख तंबोल समाण्या तेह॥

काने कुंडल झलकइ तिया, सूरिज चंदरी ऊपम जीया।

बांहइ बांध्या बहरखा भला, सोवन चूड़ी खलकइ निला॥

आंगुलीयां सोहइ मूंदड़ी, सवा लाख री हीरे जड़ी।

कंठनि गोदर उरिवर हार, पाई नेउरि झण झण कार॥

सोलह सिंगार संपूरण कीया, नाचइ गावइ गाढी तीया।

आपण पणा संभालइ प्रिया, बेऊं पक्ष ऊजालइ त्रिया॥

देव तणी देवी हुइं जिसी, राय तणी अंतेउरि जिसी।

ते देखी देव खलभलइ, राय कुंवरी इसी परि बलइ॥

(रा) जाणे तिणि गढि पड़िउ पुलउ, लोक सहू को लागउ बलउ।

अरथ भंडार संजति समुदाय, राछ पीछ बलइ तिणि ठाउ॥

सोना जड़ित बलइ पलाण, जीण साल हथियार लगाम।

पलंक ढोल कमखानइ पाट, चरू त्रंबालु कचोला त्राट॥

करणाली सोना रूपा तणी, गरथि भरीय बलइ अति घणी।

कुमखा कतीफा जुन पटकूल, सउड़ि तलाइ तणा अति पूर॥

एकवीस भूमिया बलइ आवासि, जाइ झाल लागी आकासि।

हणवंति जेम पजाली लंक, ते बीतक बीता रिणथंभि॥

जमहर करी पडूंतउ राउ, को ऊगरिउ तिणि ठाउ।

उत्तम मध्यम (को) लहइ पार, सवा लाख नउ हुवऊ संहार॥

गढ सगलउ मुकलावइ ताम, चिंहु पोलि फिरि कीयउ प्रणाम।

पातिसाह नइ पूठि देसि, चहुयाणाइ गढ वलि आणेसि॥

मुकलावइ देहुरा रा देव, कोठारे गयउ तिणि खेवि।

वावि सरोवर नगर विहार, मुकलावइ भंडार कोठार॥

ऊभउ रहि जोवइ कोठार, धान भर्‌या दीसइ अंबार।

जाजउ वीरमदे बे मीर, गढ राखिस्यां मरि हमीर॥

राय कहइ बंधव सुणि बात, या कीसी बोली तइं घात।

अनरथ हुवउ घणउ तिणि ठामि, हिव रहि नइ करिस्यां कुण काम॥

दूहा

वीरमदे हम्मीरदे, मीर नइ महिमासाहि।

भाट नइ जाजउ प्राहुणो, रहिया गढ मांहि॥

जमहर करी छड़उ हुयउ, हमीरदे चहुयाण।

सवालाख संभरि धणी, घोड़इ दियइ पलाण॥

छत्रीसइ राजाकुली, ऊलगता निसि-दीस।

तिणि वेला एको नहीं, उवाढउ लेवहु ईस॥

हाथी घोड़ा घरि हुंता, उलगाणा रा लाख।

सात छत्र धरता तिहां, कोइ साहइ वाग॥

नगर (लोक) मोह मेल्ही करी, घोड़इ चढ्यउ हमीर।

कदि ही जुहार आवतउ, पालउ पुलिइ ति वीर॥

बांधव पालउ देखि करि, गहबरीयो हम्मीर।

इणि घोड़उ मारि करि, पालउ चाल्यउ राउ॥

पगि पाहण लागइ घणा, लोही वहइ प्रवाह।

महिमासाह कांधइ करइ, बंधव वेला (ह) मीर!

देव सहु मनि काल मुंह, सूरिज प्रमुखज केवि।

तीनइ त्रिभुवन डोलिया, राय हमीर देखेवि॥

(ए) खाज्यो पिज्यो विलसज्यो, ज्यां रइ संपइ होई।

मोह करिज्यो लख्मी तणउ, अजरामर नहिं कोइ॥

(ए) खाज्यो पीज्यो विलसज्यो, धनरउ लेज्यो लाह।

कवि ‘भांडउ’ असउ कहइ, देवा लांबी बांह॥

चउपई

भाट नइ राय दीधउ काम, दाध दिवाड़ेइ रूड़इ ठामि।

घोर घलावे बेऊ मीर, इसउ आदेस दियइ हमीर॥

‘जाजउ’ ‘वीरमदे’ हसमस्या, पिहिली किलउ अम्हे झालिस्या।

हाथ जोड़ि बे बोलइ मीर, अवसर हमारउ आज हमीर॥

म्हाथी दुख सहीयउ अति घणउ, नाक नाम्यउ पणि अपणउ।

पहिला जे तुम्ह आगलि मरां, थारा मुंग उसांकल करां॥

बेऊ मीर भिड़इ अति भला, मारइ कटक घणा एकला।

भिड़इ ‘देवड़उ जाजउ’ भलउ, वीरमदे अति कीधउ किलउ॥

भाट कहइ सुणउ महाराज, कुण नइ प्राण दिखालउ आज।

राय पवाड़उ कीयउ भलऊ, आपण ही सारथउ जै गलऊ॥

दूहा

संवत तेरह इकत्तरइ, जेठ आठमि सनिवार।

राउ मूषउ गढ पालट्यउ, जाणउ इणि संसारि॥

चउपई

धरा पीठ पड़ियउ ‘हमीर’, ऊभउ भाट बोलइ जई मीर।

‘जाजउ’ सिर सिर ऊपरि कीयउ, जाणे ईश्वर तिणि पूजीयउ॥

‘वीरमदे’ रउ माथउ देठि, बेउ मीर पड़्या पग हेठि।

देवलोकि जइ बइठउ राउ, कुड़ि रखवालइ भाटज तेऊ॥

राति बिहाणी हुवउ परभात, पातिसाह तिह मेल्हउ खाट।

हमीरदे पड़्यउ छइ जिहां, पालउ ऊपरि आव्यउ तिहां॥

सींगणिगुण तोड़इ सुरताण, आलम साह खाई (न) खाण।

‘रिणमल’ तीरइ पूछइ पतिसाह, तुम्हारा साहिब कुण इह मांहि॥

घणइ द्रोह आगइ तिणि कियउ, खाते पीते आकज लीयउ।

मदि माता हूया जाचंध, पगस्यउ राऊ दिखालइ अध:॥

मोटउ पृथवीपति राव, भली परि झूझ्यउ तिणि ठाई।

संभरिवाल सरीसउ बली, कोई हींदू ईणइ कली॥

पतिसाह कुमख्यउ अति घणउ, सइ हाथि आप दियउ खापणउ।

‘बिरद’ नाल्ह (भाट) बोलइ तिणिठाइ, पतिसाह नइ दीधी द्वाहि॥

बोलइ भाट करइ कइवार, बोलइ विरद अतिहि अपार।

धन जननी हमीर दे, सरणाइ वि जइ पंजरो सूरो॥

दूहा

तुं आलम अल्लाह तुं, तूं अलख्ख करतार।

वाच संभालि आपणी, उचित आपि खुंदकार॥

सिरि सिरि ऊपरि देखिकरि, पूछिउ आलम साहि।

भाट कहइ जि कुण आदमी, हुआ कलि माहि॥

रिणथंभवर जे जलहरी, राई हमीर बइठउ ईस।

वइजलदे ‘जाजउ देवड़उ’, पूज्यउ साहिब सीस॥

यउ वर वीरमदे वली, बंधव राय हमीर।

जु ‘महिमासाह’ ‘गाभरू’, थारा घर का मीर॥

इय चहुयाण ‘हमीरदे’, सरणाई रखपाल।

‘अलावदीन’ तुझ आगलइ, मोटउ मूउ भूपाल॥

मान मेल्यउ आपणउ, नमी दीधउ केम।

नाम हुवउ अविचल मही, चंद सूर दुय जाम॥

इन्द्रासणि ‘हम्मीरदे’, जोवइ ‘नाल्ह’ की वाट।

उचित देई बुलावि नइं, करी समाध्यउ भाट॥

‘नाल्ह’ कहइ सुरताण नइ, थापणि दइ मुझ आज।

भाट नइ मुकलावि परहउ, हमीरदे कइ राजि॥

चउपई

पातिसाह ‘नाल्ह’ नइ कहइ, मांगि जि काई थारइ मनि गमइ।

गढ अरध देस भंडार, मांगि मांगि लाइसि वार॥

अरथ गरथ देस भंडार काम, साथि किंपि आवइ सामि।

जइ तूंठउ आपइ खुंदकार, द्रोहांति नइ परहा मारि॥

स्वामीद्रोह करइ मित्रद्रोह, विश्वासघात करइ नर सोई।

थापणि राखइ प्रकासइ गुझ, सो नर मारीजइ अबूझ॥

जे हुता मोटा परधान, बूंदी सरिखा भोगवता ग्राम।

सइं हथि बीहड़ लहता बेउ, पगस्यउ राव दिखाल्यउ तेउ॥

बाण्या हाथि हुंता कोठार, राय हमीर लहतउ सार।

दास किराड़ कूड कीयउ घणउ, धान नाखिउ कोठारा तणउ॥

रणमल, रायपाल, वाण्या तणी, खाल कढाइ अंगुठा थकी।

भाट समाध्यउ गाढइ होई, कलि मांहे पाप करइ नवि कोई॥

जइ तूठउ (तउ) आपइ तउ आपि, भाट नइ वलि द्यइ निरबाप।

पातिसाह विमासइ आप, रिणमल रिउपाल मार्‌या नहीं को पाप॥

जयइर लहता एता ग्रास, तीया मांहि कुण कीधा काम।

पातिसाह दीधउ फुरमाण, खाल कढावउ त्रिहु नी तिणि ठाम॥

पापी नइ आपड़ीयउ पाप, कीधउ समाध्यो गाढउ भाट।

पातिसाह उसकल हूवउ, हणी भाट सुरगापुरि गयउ॥

रजपूता ने दीधा दाध, घोर घलाव्या (बेऊ) मीर अदाध।

गंगामाहि प्रवाहउ राइ, घणउ भलउ कीधउ पातिसाहि॥

धनुपीता चहुयाण तणउ, मात्र पख्य उजाल्यउ घणउ।

धनु धनु जीवी राय हमीर, जिणि सरणाई राख्या बे मीर॥

मोटउ मीर महिम्मासाह, जीह पूठि आव्यउ पतिसाह।

जाजा वीरमदे रा नाम, जग ऊपरि हुवा तिहरा नाम॥

भाट घणउ सनमान्यउ ताम, स्वामी काज कीधउ अभिराम।

वयर वाल्यो हमीरदे तणउ, कलि माहि नाम राख्यउ आपणउ॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीरायण ,
  • सिरजक : भांडउ व्यास ,
  • संपादक : भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै