ठग ठग सगळी छंडि तुव मोह खड़ग अति तिक्ख।

जै सिरु रखहि आपणो तो मानिजु यह सिक्ख॥

ठगण बुधि मम करसि मर्म पर तक्किण खंडिसि।

पर निंदा मम करसि देखि पर दोष म जंपिसि॥

न्रिधण देखि मम हसति मूढ जांणवि मम विलसति।

पूंठि परोखि म कहसि देखि पर नारि ण उल्हसि॥

यह सीख अवर झुट्ठम चयसि कहत कूसल मति मान हसि।

सुपन तरि इहि संसारि रसि हो पंडित देखि म वीस रसि॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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