नहीं आवंण नहीं गुवंण, नहीं भुवंण नहीं थो घंण।

नहीं जुरा नहीं जोबन, नहीं जीव जामंण मरंण।

नहीं दोरै नहीं भिसति, नहीं ओपति नहीं खपति।

नहीं इला नहीं आकास, नहीं फळ पात अफळ पति।

व्रहमंड पिंड नहीं विस्वा, सबद बोल किण्य परुं।

क्रतार क्रंम कवि तेज पयंपै, हुंता तहीयां केम हरुं॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता : तेजोजी चारण ,
  • सिरजक : तेजोजी चारण ,
  • संपादक : कृष्णलाल बिश्नोई ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
जुड़्योड़ा विसै