धर्म्मु धर्म्मु सबु जग कहत धर्मु कोइ लहंति।

अलख निरंजन ज्ञानमय इह तन मध्य रहंति॥

धर्मु धर्मु जग कहै धर्मु नर थोड़ा बुझय।

ब्रह्म वसय तनु मध्य मोह पट लहण विसुज्झय॥

सदगुरु केरा वचन एहु कजल करि मंजउ।

हृदय कवल जे नयण सुमति अंगुलि किर अंजउ॥

जिम मोह पटल फिहै सयल सयल दृष्टि प्रकार फुरंति अति।

श्री मानु कहै मति अगलौ हो धर्म पिछानहु एह गति॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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