लुटण काजि कुटुम्ब सबु दुक्ख दिंहि जि बलिंत।
बर लक्कड़ देखउ नरहु ते सिरसा डज्झंति॥
लूटण काजि उपण सयल अप स्वारथ कारी।
पुत्त कलत कुटुम्ब सह धर मांहि धुतारा॥
ल्याउ ल्याउ दे देहि कहै तिन्हलो अति बढै।
लूटि खोसि सबु लेइ अंति कंधै करि कढै॥
मुक्किवि मसाण खिण एक महिं दे कूंचो देखत टलै।
बरि लक्कड़ मांनु कहंतु इमु हो मतक सिरसा जे टलै॥