कलि में नर एहा घणा, मनि कपटी मुख मिट्ठ।

सील सुमति व्रत रच्चणा, ते मैं विरला दिट्ठ॥

कपट करै हसि देइ हृदय छुरिका अभिमानी।

पाव धरइ भुंई फुंकि डाव पड़िया वुग ध्यानी॥

माया परधण कजि आप स्वारथि मुख मीठा।

इह बुधि करत विटंब सुतो हमि लक्षि कु दीठा॥

अति सील सुमति अति धर्मरत अति दयाल अति सुद्ध गुण।

श्री मान कहै मति अग्गलो होते हमि विरला दिट्ठ जणं॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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