करउ क्षिमा क्षिण एक क्षिण जै गुरु सीख सुणंत।
कोप कुदालो तिक्ख अति सिव मंदिर रह खणंति॥
करो क्षिमा तजि कोप कोप काया बन जालै।
कोपु परत्तहं हानि कोप सुख संबल टालै॥
कोप जती तपु जाइ कोपु जसु किति विकारी।
कोपु हलाहलु खाइ कोप ऊरि हणै कटारी॥
मम करउ कोपु भुलिवि अधिकु सरल सुकोमल होऊं नर।
श्रीमान कहै मति अगलौ हो कोप कुदालो मुक्ति घर॥