जण भुल्ला परमत्थ पद लग्ग कुटुंबह सत्थ।

भवसागरह पंडत तिन्हं कवण लगावै हत्थ॥

जण भुल्ला परमत्थ लग अति पेम कुटंबै।

विणु कारणि बिणु काजि देखि जगु जेम बिंटवै॥

एक पसै कण काजि राजु तिहु लोकंह वंछइ।

अधिकु दुरासा रच्चि पछै मरि दुर्गति गछै॥

तब सहै दुखु आया उदै कहै मानु लिखा वयणु।

निज धर्म्म विना भव दधि पड़त हो हस्तां लंबण दे कवणु॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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