हुकम कियो पतिसाह, नारि सिंगार बनावहु,
तेल-कुंड भर धरो, आय दीदार दिखावहु।
हुरमा सकल निहार, तबै राघव यूं भाखै,
हंस गमन, मृग नैन, रूप रंभा कौं राखै।
चित्रन, हस्तन, संखनी, पातसाहजादी घणी,
सरस त्रिया में सुंदरी, नहीं साह घर पदमणी॥