काहेकुं मित्त ज्युं प्रीति न पाळत प्रीति की रीति समूळ न जाणइ।
नेह करइ करि छेह दिखावत, सयण कुसयण उभय न पिछाणइ।
रोस करइ ज्युं विचार सनेह, सनेह पुरातन चीत न आणइ।
सिंह कइ कवण सगा असगा, सबही सरखा ‘जसराज’ वखाणइ॥