काहेकुं मित्त ज्युं प्रीति पाळत प्रीति की रीति समूळ जाणइ।

नेह करइ करि छेह दिखावत, सयण कुसयण उभय पिछाणइ।

रोस करइ ज्युं विचार सनेह, सनेह पुरातन चीत आणइ।

सिंह कइ कवण सगा असगा, सबही सरखा ‘जसराज’ वखाणइ॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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