इह संसार असार, सवु मे मे करि मम भूल्लि।

दियो सुपत्तह उबरै, अबसि करिबो कल्हि॥

यहु संसारु असारु, मित्त मम सारा रिजै।

पुत कलत्त कुटुम्ब, मोह अग्गिहि मम उज्झहि॥

होहि सूर धुरि धवल, धरम रथ खंचहि धोरी।

उर्द्ध मध्य पयालि, लीह जिम लीजै तेरी॥

दीसंति जो कछू सो अथिरु, भुजि मत मेरी मेरी करहु।

श्री मान कहै मति अग्गलौ, हो न्याय जीव दुग्गंति भमै॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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