गर्भवास दुखवास बहु मित्त किजै नेहु।

अशुचि विधाता निर्भयो जानि कुच मारह गेहु॥

गर्भवास धिक्कारु मित्त तुम लाज दीजै।

जण कुच मार अधोड़ि अधो मुखि टांग धरिजै॥

जहां कृमि बसु वासु पासु मल मुत्तह भरयो।

हाड रुधिर तुव मास अशुचि धर विधना करयो॥

दस मास अंति यंत्रह युगति खंचै कनक सुनार जिम।

तिहि गर्भ दुख मनहरु कहत हो मित चतुर नर वसइ किम॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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