चक्खि पिक्खियोबन खिसत देखिण कर्महं दाउ।

नीर गए छल्लरि कवै ना कुछु फुरै उपाउ॥

चक्खि उघाड़ि अयाण मोह बसि काहे भुल्लै।

अरहट जिम संसारु देखि जिम भित्त हिचलै॥

राग दोष दुइ वृषभ कर्म काठु जु मन मालै।

सास घड़ी तन कूप आव जलु भरि भरि रालै॥

जागिसि अयाण सू तो कहा करि कछु उत्तिम धर्म्मुमय।

जलु गये मान झल्लरि कुवै हो करि कछु फुरै उपाड़ जौ॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी
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