आज सुहाणी रात मिलण री, हौळे सी मुळकी आई।
नैण छिपाती, हियै समाती, सोनळ, छिब सामी आई॥
मन में नवी उमंग उमड़ी, सुणस्यूं इब मीठी बाणी,
हूं चुप हो, अचाणचक बोल्यो, नैणां तो खोलो राणी।
बोली पण बोली ना बोली, बोलण सो मुंह करता ही,
आंचळ नै झटको दे खैंच्यो, होठ फड़कता रैग्या ही।
पहलो ही मुखड़ो निरख्यो हो, अधरां पर लाली छाई।
नैण छिपाती हियै समाती, सोनळ छिब सामी आई॥
धीरै सूं मुखड़ो मुळकायो, सीख गयो हूं आलिंगण,
भाव उठ्या अन्तस में ज्यूंही स्नेह कियो लीनो चुम्बण।
गळै लाग छाती मिलता ही, बिजळी, दौड़ी रग-रग में,
सगुण रूप हो आकांक्षा, बढती ही ज्यावै पल-पल में॥
हिवड़ो हो खाली जद तांई, पण, आज छबीली मन भाई।
नैण छिपाती, हियै समाती, सोनळ छिब सामी आई॥