थारी कलम री मार

भोत गै’री है यार

म्हांनै अंदर तांईं आहत करगी,

सत्ता रो अस्तुति-गीत पढ्यो

आतमा

इकतारै रै तार तरियां सिहरगी,

चार पेट अर चौंसठ दांत

थारी छात तळै पळै

आ तो म्हैं जाणै हो

पण पीढियां री जीभ माथै

जिंदा रैवण री चाह रो बौपार करौला–

म्हारो मन नीं मानै हो।

समै री सकल नै

आपरो चै’रो सूंप’र

थे आ कांईं अणहुणीं करग्या

कै लोकलाज नै सरमां मारता

सरकारी अखबार रै

सिरफ अेक सफे में मरग्या।

आखी जूण

आपरी नस-नाड़ियां रो

रगत बाळणियां-म्हारा घणमोला मींत।

म्हारी सुभकामनावां स्वीकार करो

कै अभाव अर अकाळ सूं ग्रस्त ईं मुलक में

आप भूख सूं नीं

बदहजमी सूं मरो।

स्रोत
  • पोथी : थार सप्तक 5 ,
  • सिरजक : जनकराज पारीक ,
  • संपादक : ओम पुरोहित ‘कागद’ ,
  • प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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