रोटी री आस होवै

जे मनै भी देवता सार विश्वास होवै

म्हारी मां री दुखती काया होवै

बापू नै भी मिलती जे माया होवै

तो घरां कुण कोनी सोवै।

मां रै हाथ री किण नै कोनी भावै

आप रै बाप नै कुण कोनी चा'वै

कुण जाण करगे दादा-दादी स्यूं दूर जावै

सब गरीबी रा खेल है भाई

नीं तो घरां कुण कोनी सोवै।

कोई कैवै सहर में मज़ा लेवण जावै

कोई कैवै आनै तो पढ़णो ही कोनी आवै

आनै तो बस कविता अर कहाणियां भावै

साची कैवूं जे आं स्यूं म्हारी कमाई होवै

तो घरां कुण कोनी सोवै।

जिकां साथै रोज बात होंवती

अब बै भी झूठी बातां बणावै

नौकरी तो प्रीत स्यूं भी दूर राखै

पईसां स्यूं अंदाजो लगावै, कै कुण म्हानै चा'वै

जे घरां ही पईसां री मसीन होवै

तो घरां कुण कोनी सोवै।

हूं भी प्यारो गाम छोड्यो

छोड्यो घर भी अेक नौकरी सारू

अर ईं ओपरै सहर में आयो

जे म्हारै ही घरां बैठ्यां पैंसन आवै

तो घरां कुण कोनी सोवै।

सब खेल अेक नौकरी रा है

फगत अेक नौकरी रा

नीं तो घरां कुण कोनी सोवै

नीं तो घरां कुण कोनी सोवै।

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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