ओ-उर्जा रो अखूट वट है
ऊंचो-घणो ऊंचो अर गैरो, आप
कितरी ऊंची छलांग लगावोगा?
इण सूं कांई कितरो सौध लावोगा?
ओ लोक कल्याण कारी-सूरज
मैं थांनै सूंपूं हूं।
ओ हेम ऊजळी रोसनी को लोक है
ओ भी कम ऊंचो कोनी है, आप
कितरो जोर अजमावोगा?
इणसूं कितरा लोगां रो भलो कर पावोगा?
इमरत रा राहत कोश नै किस तरै लुटावोगा?
ओ धनवंतरी सरीखो सुघड़ चन्द्रमा
मैं थांनै सूंपूं हूं।
ओ करम भौम वाळो कुरूखेतर है
माया नगरी री चक्कर घिन्नी सरीखो
आप कितरा पुण्य कमावोगा?
कृष्ण-संजय बण’र
किण-किण नै गैलो बतावोगा?
कितरा विदुर, अर्जुन रा भायला बण’र
कठै-कठै राहत पूगावोगा?
ओ जळ, रितु, फळ अर सम्बलवान
जीतण रो रूप विधान
मैं थांनै सूंपूं हूं।
ओ है प्रेरणा रो कळप रूंख
परकास, अगन, बसन्त, पतझड़
जड़-चेतन रा इतिहास रो साखी,
आप कितरा आंगण दीवा रोसण करोगा?
कितरी मूंडेरां नै जगमगावोगा?
कितरा आराधकां याचकां नै तिरपत करावोगा?
आ संचित पुण्यां री पूंजी सरूपा
कामधेनु कलम मैं थांनै सूंपूं हूं।