पड़दो उठावो।

ऊंडी मारी चिरळाटी कवि

अेकलो बैठ्यो—रंगसाळा में।

कुण उठांवतो?

सबद हा,

कवि दी ही वांनै घणी रियर्सल

करणो हो सबदां नै नाट्य

उठावणो हो पड़दो—अरथ सूं।

वै भाज्या।

जिणमें, जिणरो, जको

करणो हो अभिनय

नीं हुयो।

छेवट कवि करियो

सबदां रो नाट्य।

कवि देख्या—

नाट्य देखता

थाकल सबदां नै।

स्रोत
  • पोथी : उतर्‌यो है आभो ,
  • सिरजक : मालचन्द तिवाड़ी ,
  • प्रकाशक : कल्पना प्रकाशन, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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