बेली म्हारा!

हिड़दै में उपजी विस-बेल

कीकर रैवैला अविछळ मानखो?

कठै सूं आवैला उजास

सूरज रा सातूं घोड़ा थाकिया?

बेली म्हारा!

भूख री धूरी माथै रोज

परकम्मा करै धरती बापड़ी

कीड़ीनगरो हुई मिनखाजूण

बिगड़्यो है कुदरत रो माजणो।

बेली म्हारा!

रचना रो गीगो सतमासियो

किंयां भरैला सखरा पांवडा

सबदां रो बिगड़्यो उणियार

अरथां नै मिरगी आयगी।

बेली म्हारा!

मिनख जड़ता रा बणग्या थान

मोल पुराणा उदई चाटगी

डाढ़ी कोझी चालै रे अनीत

मिनख-मिनख में हुयो आंतरो।

बेली म्हारा!

जीवै है तिरसंकू री जूण

कुबद कमायां आपोआप री

सुपनां रो मुरझायो रचाव

कठै सूं लावां संजीवणी?

बेली म्हारा!

मरै अधगावळा लोग

किंयां धाको धकांवता

धूरी मोड़ै ऊभो रैवै काळ

धचकै सूं करलै गासिया।

बेली म्हारा!

आंधी सूं भरग्यो गिगनार

द्रिस्टी धूंवैं रा गाभा पैरिया

फूलां रा गोखां खोलै कुण

गिंध बापरगी च्यारूं मारगा।

बेली म्हारा!

चेत सकै तो थूं चेत

समझ समै रै सुर-ताळ नै

सुपनां रो रूपाळो रचाव

उडीकै थनै घर रै बारणै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भवानी शंकर व्यास’विनोद’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
जुड़्योड़ा विसै