दिन-दिन तपतो आभो, धोरां री बळती बाळू रेत।

सावण निकळ्यो जावै सूखो, मेह नै तरसै बळता खेत॥

खेजड़, बोरड़, फोग, रोहिड़ा नै काट्या जड़ां समेत।

मचावै घमसाण प्रदूसण रो, लारै पड़ग्या चोर डकेत।

ढोर-डांगर छायां नै तरसै, पंछी ढूंढ़ता रैन बसेरा।

दूर-दूर तक नीं दिखै हरियाळी, जंगळ सीमेंट रा होत पसेरा॥

आपां री तो मिनखा जूणी, मन चावां खाल्यां गिटल्यां।

कूलर पंखा ए.सी. आगै सुख चैन स्यूं आपां लिटल्यां॥

बेजुबान अै पसु-पक्षी, आं नै भी तो जीणद्‌यो।

आपां पीवां ठंडो पाणी, आं नैं भी तो पीणद्‌यो।

कुदरत स्यूं ना करो कुचरणी, मत बिगाड़ो ईं रै सिणगार नै।

मुधरा-मुधरा पंछी बोलै, मत तोड़ो ईं रै झिणकार नै॥

जे नीं संभळ्या आपां तो, आवैला दिन खोटा आगला।

ढूंढ़ता रह ज्यावोला, चिड़ी, कबूतर, कागला॥

घरां बैठी उडीकै गोरड़ी, बा कीं रा काग उडावैली।

पियो बसै परदेस, बा कईंयां सूंण मनावैली॥

किंया भेजेली संदेसो पिव नै, कठै स्यूं कुरजां आवैली।

नहीं दिखैला मोर नाचता, कठै स्यूं कोयल गावैली॥

सरादां में काढ़ोला कागोळ पितरां री,

बा धरी की धरी रह ज्यावैगी।

जे थोड़ो घणो भी मिनखपणों है,

संभळो तो ओज्यूं टेम घणो है॥

जे तूं चावै सुख स्यूं जीणो, सगळा जीवां स्यूं हेत कर।

अेक-अेक पेड़ लगावां, सगळा ओज्यूं तूं चेत कर॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : छगनलाल सेवदा ‘निशंक’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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