तो आकड़ै रो झाड़ है–

जैरिलो, आंटीलो अर बादीलो।

इण नै उगण दो अेकायत मांय

इण री मनमरजी सूं

मनचायी ठौड़, आपो आप।

थ्हारी चम्पाबाडी माय नी हुवै जायगा

ले मत दो जायगा

नी चावै इण नै बेस्वाद

संकर-खाद!

झारां रो पाणी

धोरावां रो पाणी

इण सूं तिरपत नी हुवै इण री तिस!

नी आवै इण नै

दूजै रो कूड़ो जस!

पण अै थ्हारी

गुलक्यारियां रा फूल

अै थ्हारी चम्पावाड़ी रा फूल

बळबळती लुवां रै अेकण झपाटा सूं

झुळस’र झर’र

चारण लागसी धूड़ धापो धाप!

पण, तो आकड़ै रो झाड़ है

जैरीलो आंटीलो अर बादीलो

आवै लूवां अर आवै बतूळिया

आवै आसोज्यां रो तावड़ियो छावै

निखरतो ईज जावै इण रो रूप-सरूप

दिन दूणो रात चौगुणो

चेत री चांदणी ज्यूं अन्नूप!

हां निखरतो ईज जावै इण रो रूप।

अर रूई सी कंवळी भावनावां री

सपन बीजी तितलियां

उडण लागै

उजळा-धोळा पांख लगाय’र

जुगनू सिरसी–आपो आप!

कितरा छपना आवौ

दुकाळ आवौ, छिणवा रा।

जकौ ऊभ्योड़ौ है आपरै पगां पै

निरभै निसंक

बो जूझ लेवै अन्यावां सूं आपो आप।

दूजां रा पगां सूं चालणियां रो तो

आपरी खुद री सांसां पर नी हुवै

धणियाप।

इण रा फूलड़ां नै

अपणासी कुण ई–

जो विसपाई हुवै

जो आद पुरस हुवै

अविनासी जो

नीलकंठ हुवै!

है इण रै मोल रो

कठैई कोई माप?

तो आकड़ै रो झाड़ है

जैरिलो आंटीलो अर बादीलो!

इण नै ऊगण दो–

अेकायत मांय, इण री मनमरजी सूं

मनचायी ठौड़, आपो आप!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सुरेन्द्र ‘अंचल’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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