नदी उन्हाळा में सूखगी

बैवती-बैवती थमगी

कठै गमग्यो पाणी?

पाणी री ओळ्यूं आवै

पहाड़ रो अंतस सुगबुगावै

लहरां वायरै रै मिस

खेलै लुकाछिपी रो खेल,

खेल खतम हुयां पछै

बडेरा बादळां रै लारै

अठीनै-वठीनै चक्कर खासी

बिजळियां सूं डरपती गाज सुण्यां पछै

पाछी आपरी ठौड़ आसी।

अबाणू- सूखी नदी नैं तपबा दो

उसम री माळा जपबा दो।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत अगस्त-सितंबर ,
  • सिरजक : रमेश मयंक ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृत अकादमी, बीकानेर
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