सन्नाटै रो कड़वास

घूंट-घूट पी लीदो

बैरंग कागद पीड़ा रो

कुण दिन नीं लीदो

रीढ़ री हड्डी पै दरद रा भाठा

सांसा रै हिसाब में पड़ता रैया घाटा

अमर रो अेक और

आखो दिन जी लीदो

धड़कन रै दरवाजै यादां री हांकरा

मन री गैल-गैल कांटा अर कांकरा

टूटी सुई ऊं उदासी रो

आकास हीवो लीदो

सन्नाटै रो कड़वास

घूंट-घूट पी लीदो।

स्रोत
  • पोथी : जलम भोम ,
  • सिरजक : ओमप्रकाश भाटी ,
  • संपादक : मूळचंद 'प्राणेश' ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा प्रचार प्रकाशन, बीकानेर ,
  • संस्करण : 2-3, जून-दिसम्बर
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