सूरजिया नै ओळमौ देय’र

बादळिया पाछा बळग्या

अंधारपख री रात फेरूं आयगी

उडीकता रैयग्या

खेजड़ी माथै बैठ्यां पांखी।

व्हैग्यौ अंधार घोर

जमी सूं आभै तांई च्यारूमेर

सुपनां री बातां रैयगी

आंख्यां रै ऊणै-खूणै कठै

कुण नीं बोलै

समै ज्यूं धार ली मून।

रलती रेत री छाती माथै

अेकली ऊभी खेजड़ी

फेरूं बतळावती रैयी अठै

आवता-जावता नै

पण इण मारग रा जातरू

कनै सूं निसरग्या

आपरै मांयली बळत में बळता।

फेरूं आवैला सूरजियौ

देवैला ओळमौ

म्हारी बावळी पीढ़ी नै–

मिनख देवता आया

समै री साख

पण अबकाळै

क्यूं धार ली मून, मानखै!

अंधारा रै नांव।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सत्यदेव चूरा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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