बाजार में सूका, मैंगा बेर खा कर

हैरान हुया नेताजी राजा

चढ़गा खुद झाड़ी पर जाकर

बेर खाण नै ताजा-ताजा।

तोड़-तोड़ कर मीठा-मीठा

खाया बेर घणेरा

पण उतरणो मुस्कल होगो

जतन भिड़ाया बोळा

देख इन्नै-उन्नै ताकै

कोई नीजर नीं आयो

बोळी देर थक्यां पाछै ही

यो विचार दिमाग में आयो

ईं संकट रै बीच

भायलो हनुमान ध्यायो।

थारै अेक सौ अेक रिपियां रो

लाडू पेड़ां रो प्रसाद चढ़ाऊंगो

जे म्हैं सही सलामत

पेड़ सूं नीचै उतर जाऊंगो

लेकर बजरंग बली रो नांव

थोड़ा नीचै सरक कर बोल्या,

ईं मैंगाई रै जमानै में

सौ रिपिया कठै सूं ल्याऊंगो

म्हैं तो सिरफ थारै, बाबा

पचास रिपियां रो ही चढ़ाऊंगो

सरक्या थोड़ा और नेताजी

तो आधी दूर आगा

सौ रिपियां सूं चाल्या गजबी

दस रिपियां तक आगा

जद रैयो झाड़ च्यार फुट ऊंचो

तो हाथ छोड़कर गिरगा

पटक के मार्‌यो है कोनी चढ़ाऊं

अपणी बात सूं फिरगा।

अइयां ही झांसो दे-देकर

लोगां नै भरमावै

वादां पर वादां कर-कर कै

अपणो काम बणावै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : निरंजनसिंह ‘निर्मल’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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