खुद रै ही आंगणा में प्रस्न चिन्ह बोवण द्यो।
जींणो है म्हानै भी अंधारो बोवण द्यो।
मनड़ै में काळस री अमर बेल फूलै है,
ऊपर सूं मूंडो तो म्हानै भी धोवण द्यो।
धंस रैयी धरती अर टूट रैयो आभो,
अब तो थे म्हानै जी भरकै रोवण द्यो।
खोस लिया नैंणा रा आंसू भी थे म्हारा,
मनड़ै री पीड़ा नै आज तो बिलोवण द्यो।
खोयोड़ा मिनखां में नांव लिखो म्हारो,
दरपण री छाया में म्हानै भी खोवण द्यो।
घूटण, पीड़, कुण्ठा अर झैर भर्या सुपना,
कोई तो आवैला बाटड़ली जोवण द्यो।
दुःख करियां कांई भी नीं व्हैला ‘कल्पित’,
जियां भी हो रैयो, बियां ही होवण द्यो।